दो व्हाट्सऐप नंबर एक डुअल सिम पर चलाइए

आप एक डुअल सिम फ़ोन पर चला सकते हैं। अब डुअल सिम फ़ोन पर ऐसा करना संभव है, बस सेटिंग में थोड़ा बदलाव करना पड़ेगा। व्हाट्सऐप दुनिया भर में सबसे ज़्यादा चलने वाला फ्री मैसेज सर्विस है। 100 करोड़ लोग से भी ज़्यादा इसे इस्तेमाल करते हैं और भारत में अब करीब 10 करोड़ लोग इसे इस्तेमाल करते हैं।og-whatsapp-apk

एंड्राइड फ़ोन भारत में काफी पसंद किया जाता है और 80 फीसदी से ज़्यादा लोग एंड्राइड ऑपरेटिंग सिस्टम वाले फ़ोन ही इस्तेमाल करते हैं। डुअल सिम वाले फ़ोन भारत में बहुत पसंद किये जाते हैं और बड़े और छोटे शहर में सभी लोगों के पास ऐसे फ़ोन आपको मिल जाएंगे।
कई बार लोग अपने काम और निजी नंबर को अलग रखते हैं और इसलिए व्हाट्सऐप भी अलग अलग रखने का प्रचलन बढ़ रहा है। ऐसा करने के लिए आपको थोड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी और स्मार्टफोन की सेटिंग में थोड़ा बदलाव करना होगा। लेकिन एक बार आपने ये कर लिए तो एक ही डुअल सिम वाले स्मार्टफोन पर दो व्हाट्सऐप अकाउंट चला सकेंगे। आइये इसका तरीका बताते हैं।
इसके लिए आपको डुअल सिम वाला स्मार्टफोन चाहिए और उस पर दो एक्टिव मोबाइल नंबर चाहिए। डेटा सर्विस एक पर भी एक्टिव हो तो ये दोनों आपके लिए काम करेंगे। सबसे पहले अपने व्हाट्सऐप पर जाइये और वहां पर ‘सेटिंग’ को चुनिये और फिर ‘चैट सेटिंग’ को चुनिये। इसके बाद ‘बैकअप चैट’ पर क्लिक कर दीजिये ताकि आपके सभी मैसेज का एक बैकअप तैयार हो जाए।
अब समय है अपने स्मार्टफोन की ‘सेटिंग’ में जाने का और ‘सेटिंग’ में ही जो ‘ऐप’ का विकल्प है उसे चुन लीजिए। वहां पर व्हाट्सऐप को चुन लीजिए और ‘क्लियर डेटा’ के विक्लप पर क्लिक कर दीजिये और उसे ‘ओके’ कर दीजिये।
अब अपने डिवाइस के फाइल एक्स्प्लोरर पर जाइये और व्हाट्सऐप फोल्डर में पहुंच जाइये। वहां पर ‘ऑप्शन’ पर क्लिक करके आप उसका नाम बदल कर ‘ओ जी व्हाट्सऐप’ रख दीजिये और फिर ओके पर क्लिक कर दीजिये। इसके बाद फिर से ‘सेटिंग’ में जाना होगा, उसके बाद ‘ऐप’ और फिर ‘व्हाट्सऐप’। इसके बाद और व्हाट्सऐप को अनइंस्टॉल कर दीजिये। इसके बाद
‘ओ जी व्हाट्सऐप’ को इस लिंक से डाउनलोड कर के इनस्टॉल कर लीजिए। इनस्टॉल करने के बाद इसे लॉन्च कर दीजिये। इनस्टॉल करते समय जो आप पहले मोबाइल नंबर इस्तेमाल कर रहे थे उसे लिख दीजिये। उसके बाद अपने पुराने चैट के बैकअप को आप रिस्टोर कर पाएंगे। अपनी सेटिंग को पूरा करने के बाद आपके पुराने नंबर का व्हाट्सऐप काम करने लगेगा।
अपने स्मार्टफोन के होमस्क्रीन पर आप ‘ओ जी व्हाट्सऐप’ नाम के दो आइकॉन देख सकेंगे। अब अपने स्मार्टफोन के दूसरे नंबर के लिए आपको गूगल प्लेस्टोर पर जाकर व्हाट्सऐप डाउनलोड कर के इनस्टॉल करना होगा।
उसके बाद जब उसमे अपना नंबर देने के समय आएगा तो वहां अपना दूसरा नंबर एंटर कर दीजिये।
हो सकता है आपके अपना वेरिफिकेशन कोड भी एंटर करना पड़े। अगर आप ये वेरिफिकेशन कोड नहीं चाहते हैं तो व्हाट्सऐप से कॉल का विकल्प भी चुन सकते हैं। ये कॉल के समय जो छह डिजिट का वेरिफिकेशन कोड आपको बताया जाता है उसे आपको एंटर करना होगा।
उसके थोड़ी देर के बाद आपका दूसरे नंबर वाला व्हाट्सऐप काम करने लगेगा। दोनों व्हाट्सऐप नंबर के अकाउंट के आइकॉन अलग अलग होंगे। ये करने के बाद आप काम के नंबर और निजी नंबर के व्हाट्सऐप को अलग अलग कर सकते हैं।

पुराने स्मार्टफ़ोन का कैसे कर सकते हैं इस्तेमाल

आपके एंड्रॉयड और एप्पल स्मार्टफ़ोन में इतने फीचर होते हैं कि कई बार आप उन्हें पूरी तरह से इस्तेमाल नहीं कर पाते हैं. उसके बाद भी कई लोग साल से दो साल के अंदर अपना स्मार्टफ़ोन बदल देते हैं.

पुराना स्मार्टफ़ोन या तो घर के किसी कोने में पड़ा रहता है या फिर आप उसे किसी को दे देते हैं. अगर आप उन्हें बेचने जाएंगे तो उसकी ऐसी क़ीमत मिलेगी जो आपके गले नहीं उतरेगी.

ऐपल हर साल नए मॉडल बाज़ार में लाता है और एंड्रॉयड ऑपरेटिंग सिस्टम इस्तेमाल करने वाली दर्जनों कंपनियां तो शायद हर हफ़्ते नए फ़ोन बाज़ार में उतारती हैं.

अगर आपके घर में पुराना स्मार्टफ़ोन रखा हुआ है तो उसका बढ़िया इस्तेमाल आपको बताते हैं.

अगर आप गाडी में म्यूज़िक सुनने के शौक़ीन हैं तो पुराना आईफ़ोन या एंड्रॉयड डिवाइस काम आ सकता है. बस कुछ म्यूज़िक और कार से जुड़े सॉफ़्टवेयर को डाउनलोड कर लीजिए.

अगर आप जीपीएस के लिए आईफ़ोन को इस्तेमाल करना चाहते हैं और उसे लैंडस्केप मोड में देखना चाहते हैं तो SBRotator (http://moreinfo.thebigboss.org/moreinfo/depiction.php?file=sbrotator4Data) डाउनलोड करना होगा. क़रीब 200 रुपये ख़र्च करके आपके लिए ये बहुत काम का ऐप होगा.

गर आप पुराना एंड्रॉयड स्मार्टफ़ोन इसी काम के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं तो गूगल प्ले स्टोर पर अल्टीमेट रोटेशन कंट्रोल (https://play.google.com/store/apps/details?id=nl.fameit.rotate&hl=en) डाउनलोड कर सकते हैं.

इस स्मार्टफ़ोन को आप अपनी गाड़ी में रख सकते हैं और जब ज़रूरत हो तब इस्तेमाल कर सकते हैं. गाड़ी में म्यूज़िक सुन सकते हैं या जीपीएस सिग्नल के सहारे रास्ते के बारे में जानकारी ले सकते हैं.

अगर एंड्रॉयड स्मार्टफ़ोन को डेटा कनेक्टिविटी चाहिए तो उसे अपने नए स्मार्टफ़ोन से कनेक्ट कर दीजिए उतनी देर तक जब तक आपको चाहिए. और अगर आप ऐपल इस्तेमाल कर रहे हैं तो पुराने आईफ़ोन को टीथरिंग के सहारे अपने नए आईफ़ोन से कनेक्ट कर दीजिए.

पुराने ज़माने में कहते थे कि मरा हुआ हाथी भी सवा लाख का होता है. आजकल कह सकते हैं कि बेकार पड़ा स्मार्टफ़ोन भी आपके लिए बेशक़ीमती हो सकता है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

Source: BBC.com

 

यहाँ विश्व के सबसे कम उम्र के सीईओ के एक प्रेरक कहानी है (सुहास गोपीनाथ)

मेरा जन्म एक  मध्यम वर्गीय में हुआ . मेरे पिता ने भारतीय सेना के लिए एक वैज्ञानिक के रूप में काम किया. और में  बेंगलुरू में वायु सेना के स्कूल में  अध्ययन  करता  था

बचपन में, मैं  जानवरों और पशु चिकित्सा विज्ञान अधिक रुचि लेता था  जब मैंने देखा   कि मेरे दोस्तों के घर  में कंप्यूटर है और सब कंप्यटर की  बारे में बाते करते थे  में तभी तय किया की में भी computer सीखूंगा

लेकिन हमारे घर में कंप्यूटर नहीं था. उन दिनों में,  कंप्यूटर बहुत महंगे थे और हम afford  नहीं कर सकते थे

फिर में क्या करता . मेरे घर के पास एक  इंटरनेट कैफे था  अपनी  15 रुपये की मामूली मासिक जेब खर्च के साथ, मैं हर दिन नेट सर्फ नहीं कर सकता है.

मैंने देखा कि दुकान से 1 बजे से 4 बजे तक दोपहर में बंद  होती है इसलिए में दुकानदार से अपने स्कूल टाइम के बाद दुकान खोलने और  ग्राहकों की देखभाल की पेशकश की

सौदेबाजी में,  वह  मुझे मुक्त में  नेट browse करने देता था यह  मेरे जीवन का पहला  कारोबारी  सौदा  था जो  एक सफल निकला,

एक बार जब मुझे मौका मिला,  दुकान संभाले का और  नेट  ब्राउज़  करने का तो , मैंने वेबसाइटों का  निर्माण शुरू कर दिया, यह कोई समय में मेरा जुनून बन गया.

मैं source technology को खोलने के लिए कांटे की शकल के बाद मैं कैसे वेबसाइटों का निर्माण करने के लिए ई – पुस्तकों के लिए तलाश शुरू कर दी. परन्तु propriety सौर्सस में बनाने के लिए  में उपलब्ध  नहीं थी .

तो, मैं open source का उपयोग करके वेबसाइटों का निर्माण शुरू कर दिया.

पहली बार के लिए एक वेबसाइट का निर्माण अनुबंध पर हो रही

वेब जहाँ मैं पंजीकरण और अपनी सेवाओं की पेशकश करने के लिए वेबसाइटों का निर्माण किया और  एक स्वतंत्र बाजार है. जहा मैं खुद  को वहाँ एक वेबसाइट बिल्डर के रूप में पंजीकृत.किय
पहली वेबसाइट जो मैंने तैयार की थी वो नि: शुल्क थी क्योकि मेरे पास कोई  references  नहीं था  ह न्यूयॉर्क में एक कंपनी के लिए थी

मेरे पहेली  $100  थी जब मैंने  एक और वेबसाइट के निर्माण किया उसे समय मेरे उम्र  13 वर्ष की थी मगर मेरे पास कोई बैंक खाता नहीं था इसलिए मैंने  अपने पिता से कहा कि मैंने
एक वेबसाइट का निर्माण  किया है और उसके लिए मुझे यह भुगतान  मिला है .

मुझे पैसे मिल रहे थे मगर में उत्साहित  नहीं था क्योंकि  money  कोई  factor  नहीं थी जो मुझे अपनी और आकर्षित  करे , मुझे technology सिखने का जुनून था जो मुझे अपनी और आकर्षित  करती थी इसलिए मेने मुक्त  में भी वेबसाइटों का निर्माण करता था उसे समय में  केवल एक 9 कक्षा का  छात्र था.

उसके बाद, मैं अपना खुद का पोर्टल का निर्माण किया  और उसका नाम  Coolhindustan.com. रखा  यह NRIs पर ध्यान केंद्रित किया गया . यह एक पोर्टल था , जहाँ मैं अपने कौशल का प्रदर्शन करना चाहता था.

उसके बाद, कई कंपनियों ने मुझे  उनका web designer  बने के लिए संपर्क किया

जब मैं 9 कक्षा में  था, मैं काफी पैसा बनाया था खुद के लिए एक कंप्यूटर खरीदने के लिए. उस समय, मेरे भाई इंजीनियरिंग की पढाई कर रहा था और मेरे पिता ने सोचा कि उसे एक कंप्यूटर की जरूरत है.

कुछ ही समय में, मैं भी एक खुद के लिए खरीदा है. लेकिन हम घर पर एक इंटरनेट कनेक्शन नहीं था.

मैंने काफी समय नेट कैफे पर वेबसाइट पर काम करके  खर्च किये उससे मेरी पढ़ाई  पर भी प्रभाव पड़ा . मैंने  9 कक्षा के बाद अपनी पूरी गर्मी की छुट्टी कैफे पर काम करके बिता दी

अमेरिका से एक नौकरी की पेशकश को खारिज में

जब मैं 14 साल था, Network Solutions  ने मुझे US  में part-time जॉब का ऑफर दिया और उन्होंने कहा की वह US में मेरी शिक्षा भी sponsor करेगे , मगर मैंने यह ऑफर रिजेक्ट कर दिया  क्योंकि उस समय मैंने बिल गेट्स के बारे में कहानी पड़ी की कैसे  उन्होंने Microsoft. शुरू की

मैंने सोचा कि इसे और अधिक मज़ा करने के लिए अपनी खुद की कंपनी है. कई अमेरिकी कंपनियों के लिए मुझे बताओ कि मैं भी एक मूंछें नहीं था प्रयोग किया जाता है और वे असुरक्षित महसूस किया है मेरी सेवाओं लेने. वे मेरी उम्र और शैक्षणिक योग्यता के साथ अपनी क्षमता से कनेक्ट करने के लिए इस्तेमाल किया.

इसलिए मैं अपनी कंपनी शुरू करना चाहता था और  दुनिया को दिखाना है कि उम्र और शैक्षिक योग्यता (immaterial )  महत्त्वहीन है मैंने तो तय किया कि जब मैं एक कंपनी शुरू करूँगा ,में केवल  युवाओं की भर्ती ही करूँगा और मैं उनकी शैक्षणिक योग्यता और अंक कार्ड नहीं पुछ्गा

Gopinath delivering a lecture at the DLD Conference

जल्द ही मैंने 9 कक्षा की  गर्मी की छुट्टी के बाद मैंने अपनी कंपनी “ Global Inc” शुरू कर दी .
में उसका नाम  Global or Global Solutions रखना चाहता था परन्तु  दोनों उपलब्ध नहीं थे इसलिए मैंने यह “Global ” नाम रखा

मैंने अमेरिका  में मेरी कंपनी भारत के रूप में पंजीकृत की , तुम जब तक आप 18  वर्ष के नहीं हो जाते तब तक एक कंपनी शुरू करने में सक्षम नहीं हो. अमेरिका में एक कंपनी शुरू करने के लिए केवल 15 मिनट लगते हैमैं कंपनी का मालिक .और सीईओ बन गया. मेरा दोस्त,  जो एक अमेरिकी था जो एक विश्वविद्यालय छात्र था वो मेरी कंपनी के  बोर्ड का सदस्य बन गया

मैं बहुत उत्साहित था क्योकि यह वो था जो  मैं क्या करना चाहता था. उस दिन से, मैंने  अपनी कंपनी को माइक्रोसॉफ्ट  की तरह बड़ी कंपनी बनाने के सपने देखने शुरू कर दिया.

मेरे सीबीएसई प्री – बोर्ड परीक्षा में, मैं गणित में असफल रहा. स्कूल की headmistress हैरान थी   क्योंकि पहली बार मैं किसी भी विषय में असफल रहा, उन्होंने मेरी माँ को बुलाया और कहा कि वह मेरे प्रदर्शन से भयभीत थी .

घर पर, typical दक्षिण भारतीय माँ की तरह, मेरी माँ ने मुझे उसके सिर पर हाथ रखकर  कसम खाने को खा की कि मैं अब पढाई में  ध्यान दूंगा |

मैं अपनी माँ से कहा कि दुनिया के सबसे अमीर आदमी बिल गेट्स ने अपनी  शिक्षा पूरी नहीं की . तो  तुम मुझे  क्यों  मजबूर कर रही हो , मैंने उससे पूछा. तो वह कहती है   मुझे यकीन है कि उसकी कुंडली और तुम्हारी कुंडली  एक सी नहीं है

में एक ऐसी फॅमिली से आता हू  जहा  entrepreneurship  को एक पाप माना जाता है मेरी माँ काफी परेशान थी  वह चाहती थी की मैं इंजिनियर करू और फिर एमबीए करके एक अच्छी कंपनी में जॉब करू

मेरी माँ की इच्छा के अनुसार, मैंने कंपनी से चार महीने के लिए विश्राम ले लिया और मेरे की बोर्ड परीक्षा के लिए अध्ययन किया. मैं  प्रथम श्रेणी के साथ पास हुआमुझे अब अब भी लगता है कि आप अपने आप ज्ञान किताबी से  सीमित नहीं कर सकता हो , मुझे विश्वास है  practical ज्ञान और अधिक महत्वपूर्ण है.

पहले वर्ष में, ग्लोबल इंक का कारोबार 1 लाख रुपए (100,000 रुपये) था. दूसरे वर्ष, 5 लाख रुपए (500,000 रुपये) का कारोबार  हुआ

जब तक मैं 16 या 17 था , मैं अपने माता पिता को नहीं बताया कि मैं एक कंपनी शुरू कर चूका था. मैं इसे  गुप्त रखा क्योंकि मुझे लगता था की उन्हें  इस बात पर एतराज होगा. वे सिर्फ यह जानते थे कि मैं एक freelancer था.

हम वेबसाइट बनाने के लिए और भी ऑनलाइन शॉपिंग और e commerce समाधान प्रदान करते थे.
हम  अमेरिका में  कुछ प्रोग्रामर को पार्ट टाइम work  भी देते थे जब हमे खूब सारे प्रोजेक्ट मीले  लेकिन हमारा कोई ऑफिस नहीं था

जब मैं 16 साल का था, मैंने देखा है कि भारतीय आईटी कंपनियां अमेरिकी कंपनियों के लिए काम कर रहे थे के बहुमत के रूप में यूरोप में भारी व्यापार के अवसरों थे .

जब मैंने एक स्पेनिश कंपनी से संपर्क किया, तो उसने मेरे ऑफर रिजेक्ट कर दिया कि भारतीयों को स्पेनिश नहीं आती ,  एक उद्यमी के रूप में, तुम ये rejection स्वीकार नहीं कर सकते , खासकर जब तुम जवान हो.

मैं कुछ स्पेनिश विश्वविद्यालयों से पांच छात्र को काम पर रखा है और उन्हें बताया कि उन्हें अपने सफल sales के आधार पर भुगतान मिलेगा..

ये  वे लोग थे जो कंपनियों से मुलाकात करता थे  और हमारे लिए  projects हासिल करता थे , अब तक, हमने अपना स्पेन में एक घर कार्यालय खोलने का  फैसला किया.

मैंने इटली में भी यही मॉडल को दोहराया, मैंने कुछ  Italian  विश्वविद्यालय के छात्रों से संपर्क किया.

अमेरिकी समाचार पत्र ने मेरे बारे में खूब लिखा की दुनिया के सबसे कम उम्र के सीईओ जिसकी उम्र 14  है है जो भारत से एक middle class background.से है

यह भी बीबीसी के लिए एक अच्छी कहानी थी. मैं कभी उम्मीद नहीं की सुर्खियों में है. मेरे लिए, एक कंपनी शुरू करना  मेरे एक जुनून को साकार करने की तरह था.

इन कहानियों को देखने पर, जर्मनी में बी – स्कूल ने  मुझे अपने छात्रों को उद्यमिता पर बात करने के लिए आमंत्रित किया. मैं उस समय  17 का  था. अब तक,  मैंने अपनी  12 बी कक्षा पूरी कर ली थी  और बेंगलुरु में इंजीनियरिंग में  शामिल हो गए था .

बॉन में यूरोपीय मुख्यालय -जब में 18 वर्ष का था हमने अपने कार्यालय की स्थापना की . उसके बाद  हम स्विट्जरलैंड  चले गए .  छह महीने पहले , हमने वियना में अपना कार्य अच्छी तरह से शुरू कर दिया.

यही कारण है कि हम एक छोटे से इंटरनेट कैफे से हमारे कार्यों का प्रसार करने के लिए यूरोप, मध्य पूर्व, अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, आदि में महत्वपूर्ण कार्यों के साथ एक बहुराष्ट्रीय कंपनी (“multinational company”) बन गए.

जब में 18 वर्ष का हुआ , मैंने भारत में Global के नाम से कंपनी पंजीकृत (registered ) की , अपना एक कार्यालय खोला और चार लोगों को भर्ती की , मैंने अपना कार्यालय इंटरनेट कैफे जहां मैंने  अपने कैरियर की शुरुआत की थी उसके बगल में खोला.

तब तक, वह दुकान बंद हो चुकी थी और एक कर्मचारी के रूप में एक कारखाने में शामिल हो गए. जब भी मैं उससे मिला, मैं उसे कहा की तुमने मुझे क उद्यमी बनाया है, लेकिन आपने सब बंद कर दिया

हम चाहते थे कि हमारी कंपनी भी एक उत्पाद विकास कंपनी हो  और हमने शिक्षा पर अपना  ध्यान ज्यादा केंद्रित किया , इसलिए हमने एक ऐसे  सॉफ्टवेयर पर ध्यान  दिया  है कि एक बच्चे को  शिक्षा के बारे में सब कुछ का प्रबंधन हो ,
जब एक बच्चे के  स्कूल  में प्रवेश से शुरू हो और जब वह स्कूल छोड़ देता है इस तरह का

हमारे सॉफ्टवेयर भारत, सिंगापुर, और मध्य पूर्व पर 100 से अधिक स्कूलों में इस्तेमाल किया जाने लगा .

हम अब धन जुटाने की प्रक्रिया में लग गए …एक बार जब हमने ये किया, हमने अपनी कंपनी को दो पार्ट में अलग कर दिया -सेवा और उत्पाद विकास,  मैं उत्पादों पर ध्यान केंद्रित करना करना चाहता था क्योकि में  दो नावों को  नहीं पाल सकता था

मेरी डॉ. अब्दुल कलाम से मुलाकात हुई जब वह भारत के राष्ट्रपति थे. उस समय मैं 17 या 18 वर्ष का था मेरी मीटिंग 15 मिनट के लिए निर्धारित की गई थी लेकिन हम इस तरह एक गहन बातचीत में थे  हमारी  बातचीत आधे घंटे तक चली .

मुझे नहीं लगता कि मैं भारत के राष्ट्रपति से  बात कर रहा था. हमने दो दोस्तों की तरह बात की. वह मेज के पार अपनी कुर्सी पर  बेठे हुए  थे  लेकिन कुछ समय बाद, वो मेरी बगल में आकर  बैठ गए . वह इस तरह के एक नरम व्यक्ति है कि यह मेरे लिए सीखने का अनुभव था है.

मैंने हमेशा माना है कि आईटी सिर्फ तकनीक नहीं है, लेकिन एक उपकरण है कि लोगों की समस्याओं को हल कर सकती है

मैं अपनी कंपनी को एक बाजार के नेता बनाना चाहता था जो  सॉफ्टवेयर समाधान पर शिक्षा पर  अपना ध्यान केंद्रित करे

जब मैं छोटा था , मैं पैसे के बारे में परवाह नहीं करता था अब जब कि मैं अपने कर्मचारियों के लिए जिम्मेदार हूँ   हम क्या कर रहे है उसके  बारे में परवाह करता हूँ  अगर मैं पैसे के बारे में परवाह नहीं करता , हम हमारे व्यापार को बड़े  पैमाने  पर नहीं ला सकते थे

जब मैंने  बेंगलुरू में एक नेट  कैफे  से अपनी कम्पनी की शुरू , मैंने कभी सोचा  नहीं था की एक दिन  मेरी कंपनी एक बहु मिलियन डॉलर की कंपनी हो जाएगी और मैं विश्व बैंक बोर्ड पर एक सदस्य के रूप में होगा.

जो भी मैंने  ड्राइव  की वो मेरे जूनून है और अब तक.की एक अद्भुत यात्रा रही ….

— http://pranicspirit.com

 

 

मनुस्मुतिःस्त्रियों का सम्मान न हो तो शुभकर्मों का फल भी नहीं मिलता

 पिर्तभिभ्रौतृभिश्चैता पतिभिदैवरैस्तथा
पूज्या भूषयितव्याश्च बहुकल्याणमीप्सुभिः

विवाह के समय अपने कल्याण पिता, भाई, पति और देवर कन्या को वस्त्र और आभूषण से संसज्जित कर सकते हैं। कन्य इस तरह सुसज्जित करना पूजा करना कहलाता है।

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः
यत्रेतास्तु न पूज्यन्त सर्वास्तात्राफलसः क्रियाः

जहां नारियों का आदर सम्मान होता है वहां देवता भ्रमण करते है और जहां उनका इसके विपरीत होता   वहां शुभ प्रकार के कर्मों का भी कोई फल नहीं होता

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-वर्तमान समाज में दहेज एक विकट समस्या है और देखा जाये तो मनु जी के अनुसार उसका एक तरह से विरोध ही किया गया है। उनका कहना है कि विवाह के समय कन्या को पति और भाई के साथ पति और देवर भी वस्त्र और आभूषण दे सकते हैं। एक श्लोक में उन्होंने कन्या के पिता द्वारा अपनी कन्या के लिये वर पक्ष से धन लेना वर्जित बताया  है पर यह कहीं नहीं कहा कि कन्या को वह दहेज दें। हालांकि आजकल ससुराल वाले कन्या के लिये गहने और वस्त्र तो करते हैं पर पहले उसके लिये कन्या पक्ष वालों से भारी राशि वसूल करते हैं। यह अनुचित और मनु द्वारा स्थापित पंरपराओं के विपरीत है।

कभी कभी तो ऐसा लगता है कि जातिवाद को आधार मानकर मनु स्मृति को समाज से विस्मृत करने का प्रयास इसीलिये  किया गया है ताकि कर्मकांडों को समाज पर लादकर उसे बैल की तरह उसे ढोते रहने को बाध्य किया जाये। मनु जी का कहना है कि स्त्रियों का जहां सम्मान नहीं होता वहां शुभकर्मों का भी फल नहीं मिलता। जबकि अनेक धर्मकर्म करने वाले अपनी स्त्रियों को दासी की तरह समझते हैं। एक बात तय है कि मनु स्त्री और पुरुष का जीवन के एक सिक्के की तरह मानते हैं इसलिये वह स्त्री के सम्मान की बात करते हैं। मनु के समय में भी मनुष्य समाज पुरुष प्रधान समाज था और आज भी है और भले ही स्त्रियां आजकल नौकरी और व्यापार में काम कर रहीं है पर वह भी अपने पति और बच्चों को उतना ही प्यार करतीं हैं जितना मनु के समय में करतीं रहीं होंगी। इस प्यार के कारण वह पति का सहयोग नहीं  मिलने पर भी परिवार के कार्यों का समूचा बोझ अपने सिर पर ले लेतीं हैं। इसके बावजूद कई परिवारों में उनको सम्मान नहीं मिलता। जहां स्त्रियां कामकाजी नहीं है तो वहां तो उन्हें और भी परेशान होना पड़ता है। स्त्रियां बहुत सहनशील होतीं हैं और अपने घर की इज्जत को ढंकने के लिये बाहर अपनी घर-परिवार की व्यथाएं नहीं कहतीं पर मनु महाराज के अनुसार पुरुषों को यह समझना चाहिए कि उनके मन से उठी आह उनके शुभकर्मों-यज्ञ, हवन और मंत्रोच्चार से मिलने वाले लाभों से वंचित कर सकतीं है।

 

-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

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जन्मदिन पर चिरंजीवी होने का प्रयोग

जन्मदिवस पर दूध (१० ग्राम), गुड़ (१ ग्राम), तिल (१ चुटकी) का मिश्रण करके चिरंजीवियों (हनुमानजी, भीष्म पितामह, अश्वथामा, मार्कंडेय, परशुराम, विभीषण, कृपाचार्य और बलि) का आवाहन करके उसका आचमन करने वाला व्यक्ति चिरंजीवी होता है ।

रोना सेहत के लिए फायदेमंद

वैज्ञानिकों ने एक बार फिर अपने अनुसंधानों से यह सिद्ध कर दिया है कि रोना सेहत के लिए लाभदायक होता है। उनके अनुसार अगर कष्टप्रद स्थिति में भी आँख से आँसू नहीं आते हैं तो तुरंत चिकित्सक को दिखाना चाहिए। क्योंकि यह एक असामान्य स्थिति है। अत: रोना कमजोरी की निशानी नहीं है बल्कि स्वास्थ्य संबंधी कई परेशानियों से बचने का उपाय है। अध्ययन में पाया गया है कि रोने के पश्चात् त्वचा की संवेदनशीलता बढ़ जाती है और रोने वाले की साँसें गहरी चलने लगती है। यह दोनों बातें सेहत की दृष्टि से अच्छी मानी जाती है।

इसलिए चिकित्सक की मानी जाएँ तो रोना सेहत के लिए लाभदायक है |

Health Tips In Hindi Is Taken From Webdunia.com

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पाक में दहशत में हैं हिंदू और सिख समुदाय

इस्लामाबाद ।। पाकिस्तान में हिन्दू और सिख समुदाय के लोगों की स्थिति बेहद दयनीय है। वे हमेशा डर और आतंक के साये में जीते हैं। अन्य समुदायों के अल्पसंख्यकों की भी यही दशा है। इसका खुलासा खुद पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग (एचआरसीपी) ने किया है।

बुरा रहा 2010: अपनी रिपोर्ट में आयोग ने खास तौर पर वर्ष 2010 को अल्पसंख्यकों के लिए बेहद खराब बताया। गुरुवार को जारी आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, ओराकजाय एजेंसी नामक इलाके में 102 सिख परिवारों में से करीब 25 प्रतिशत ने तालिबानियों के फरमान के बाद अपना घर छोड़ दिया। उन्हें तालिबान ने जजिया चुकाने या इलाका छोड़ देने का फरमान सुनाया था। सैन्य कार्रवाई के बाद ही सिख अपने घरों में लौट पाए। इसी तरह सुरक्षा कारणों से 27 हिन्दू परिवारों को भारत में शरण लेनी पड़ी। दूसरी तरफ जान-माल की धमकियों के कारण बलूचिस्तान प्रांत से करीब 500 हिंदू परिवारों को भी विस्थापित होना पड़ा।

सरकार संवेदनहीन: पाकिस्तानी समाचार पत्र ‘द डॉन’ ने आयोग की रिपोर्ट के हवाले से शुक्रवार को लिखा कि अलग-अलग धर्म का अनुपालन करने के कारण जान गंवाने वालों के प्रति सरकार ने भी संवेदना नहीं जताई। ‘ वर्ष 2010 में मानवाधिकारों की स्थिति ‘ नाम से जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि धार्मिक विश्वासों को लेकर होने वाले हमलों के निशाने पर न केवल अल्पसंख्यक हैं, बल्कि विभिन्न पंथों के 418 मुस्लिम भी इसमें मारे गए। इसके अलावा धार्मिक हिंसा के कारण अल्पसंख्यक अहमदी समुदाय के 99 सदस्यों को अपनी जान देनी पड़ी।

रिपोर्ट के अनुसार, ‘ये सभी इस बात के संकेत हैं कि आगे और भी बुरे हालात होने वाले हैं। चरमपंथियों की आवाज मुखर हो रही है, जबकि बढ़ती हिंसा और धमकियों के बीच मानवाधिकार तथा सहिष्णुता की आवाज अलग-थलग पड़ती जा रही है।’

पुलिस और अफसरों का कहर: एचआरसीपी ने पुलिस को आड़े हाथों लेते हुए कहा है कि वह अल्पसंख्यकों के खिलाफ होने वाले हमलों से उनकी सुरक्षा के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठा रही है, बल्कि कई बार वह पीडि़तों को प्रताडि़त करने और गलत आरोपों में उलझाने का ही काम करती है।

ईश निंदा का आरोपः समाचारपत्र ने एचआरसीपी अध्यक्ष मेंहदी हसन के हवाले से लिखा है कि मानवाधिकारों का उल्लंघन करने वाले अधिकतर सरकारी पदाधिकारी ही हैं। रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल 64 लोगों के खिलाफ ईश निंदा का आरोप लगाया गया जिनमें से अधिकतर जेल में हैं। एक मुस्लिम और दो ईसाइयों की इस आरोप में पुलिस हिरासत में हत्या कर दी गई।

अमेरिका में मुसलमान

असग़र अली इंजीनियर

वाशिंगटन डी.सी. की ‘अमेरिकन यूनिवर्सिटी’ में शिक्षक, अकबर अहमद, विश्वविद्यालय की ‘इब्न खल्लादुन इस्लामिक अध्ययन पीठ’ के प्रमुख हैं। व कई पुस्तकों के लेखक भी हैं।
हाल में उनकी एक नई पुस्तक जर्नी इंटू अमेरिका-द चैलेन्ज ऑफ इस्लाम (अमेरिका व इस्लाम की चुनौती) प्रकाशित हुई है। अमेरिकी मुसलमानों के मैदानी सर्वेक्षण पर आधारित यह पुस्तक, नि:संदेह इस्लाम, मुसलमानों व अमेरिका के बारे में कई मिथकों का खंडन करने में सहायक होगी। प्रोफेसर अहमद ने अपने दल के साथ, अमेरिका का व्यापक दौरा किया और लगभग हर राज्य में मुस्लिम नेताओं से विचार-विनिमय किया।
यह पुस्तक, मैदानी सर्वेक्षण पर आधारित, उच्चस्तरीय अकादमिक कृति है। प्रो. अहमद प्रशिक्षित मानवशास्त्री हैं और वे यह अच्छी तरह से जानते हैं कि किसी भी समूह या समुदाय व उसके व्यवहार को समझने के लिए उसका किस तरह से अध्ययन किया जाना चाहिए। किसी भी बाहरी व्यक्ति को-जिनमें पश्चिमी विद्वान शामिल हैं-ऐसा लग सकता है कि मुसलमान, एक एकसार धार्मिक समुदाय हैं। उन्हें ऐसा भी लग सकता है कि हर मुसलमान की राजनैतिक व धार्मिक सोच एक सी रहती है, भले ही वह किसी भी देश का निवासी हो और किसी भी नस्ल या कबीले का हो। इस तरह का गैर-यथार्थवादी दृष्टिकोण, मुस्लिम समुदाय की विभिन्नता व इस्लाम की अलग-अलग व्याख्याओं को समझने की राह में रोड़ा है।
जब विद्वानों व प्राध्यापकों के ये हाल हैं तो हम आम आदमी को ऐसा सोचने के लिए कैसे दोषी ठहरा सकते हैं? इस तरह के सर्वेक्षण-आधारित अध्ययन ही दुनिया को यह विश्वास दिला सकते हैं कि मुसलमानों में भी उतनी ही विभिन्नताएं व विविधताएं हैं, जितनी की किसी अन्य धार्मिक समुदाय में। उम्मत वह्दत (एक ही पैगम्बर को मानने वाले लोगों की एकता) जैसे नारों के बावजूद, पैगंबर साहब की मृत्यु के बाद से ही, मुसलमानों में धार्मिक व राजनैतिक विभिन्नताएं घर करने लगी थीं। जब मुसलमान अरब-जहां इस्लाम का उदय हुआ था-में भी एकसार नहीं रह पाए तो वे तब कैसे एकसार रह पाते, जब इस्लाम चीन, भारत, मध्य एशिया, सुदूर पूर्व व योरोप जैसे दूर-दराज के क्षेत्रों में फैल गया। इन क्षेत्रों की सभ्यता, भाषाएं, नस्लें व कबीले बिलकुल अलग-अलग थे।
यह सही है कि उम्मत वह्दत जैसे नारे, सैद्धांतिक तौर पर बहुत आकर्षक जान पड़ते हैं परंतु सिद्धांत और व्यवहार में हमेशा बहुत अंतर रहता है। सैद्धांतिक तौर पर, धर्म, आदर्शों व मूल्यों का प्रतिनिधित्व करता है परंतु यथार्थ हमेशा आदर्शों व मूल्यों को प्रतिबिंबित नहीं करता। मानव व्यवहार केवल आदर्शों व मूल्यों से संचालित नहीं होता। मानव अपने राजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, भाषायी व अन्य हितों की पूर्ति के लिए, आदर्शों व मूल्यों की राह से भटक जाता है। यही कारण है कि मुस्लिम समुदाय कभी एकसार नहीं बन सका। इस तथ्य को प्रो. अहमद की पुस्तक में अत्यंत तार्किक व विश्वसनीय तरीके से रेखांकित किया गया है।
अमेरिका कई अर्थों में एक अद्वितीय देश है। दुनिया के अनेक देशों के निवासियों ने उसे अपना घर बनाया है। प्रवासियों के अमेरिका में बसने के पीछे अलग-अलग कारण हैं। कुछ बेहतर जीवनस्तर की तलाश में अमेरिका आए हैं तो कुछ अपने मूल देश में उत्पीडऩ से बचने के लिए। दुनिया में शायद ही मुस्लिम रहवासियों वाला कोई भी ऐसा देश होगा, जिसके नागरिकों ने अमेरिका में अपना डेरा न जमाया हो। यही कारण है कि अमेरिका में मुसलमानों में जितनी विविधता है, उतनी शायद ही किसी अन्य देश में हो। यह पुस्तक पढऩे के बाद तो मुझे लगा कि अमेरिका में मुसलमानों की विविधता, सचमुच सिर चकरा देने वाली है।
यह मानना अनुचित होगा कि अमेरिका के सभी मुसलमानों का आतंकवाद के बारे में एक सा दृष्टिकोण हैं या यह कि वे सभी इस्लाम की विभिन्न व्याख्याओं के बारे में एक सी सोच रखते हैं। इस्लाम के लगभग सभी पंथों-वहाबी, तब्लीगी, अह्ले हदीथ, शिया, इस्माईली, बोहरा व सुन्नी- के मुसलमान, बेहतर जीवन जीने के लिए अमेरिका में रह रहे हैं। पुस्तक में दिए गए विभिन्न साक्षात्कारों से साफ है कि अमेरिका में इस्लामिक दुनिया के सभी पंथों का प्रतिनिधित्व है। एशियाई व अफ्रीकी देशों से अमेरिका आए इन मुसलमानों की एक समस्या है, उनका दोहरा राष्ट्रवाद। अपना देश छोड़कर अमेरिका में बसने वाला हर व्यक्ति अपनी मूल राष्ट्रीय सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा रहता है। साथ ही, उसे अमेरिकी संस्कृति को भी अपनाना पड़ता है। पहली पीढ़ी के प्रवासियों के लिए यह काम बहुत कठिन होता है। आगे आने वाली पीढिय़ां, धीरे-धीरे अपने मूल देश की संस्कृति से पूरी तरह कट जाती हैं। यह परिवर्तन बहुत सहज नहीं होता। मुसलमानों की दो पीढिय़ों के बीच इस परिवर्तन के कारण उपजा तनाव भी साक्षात्कारों में स्पष्ट झलकता है।
अमेरिकी पहचान भी बहुत महत्त्वपूर्ण है। और लेखक, पुस्तक के पहले ही अध्याय में इस पर चर्चा करता है। पहचान की हमारे जीवन में बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। पहचान का संबंध भावनाओं से होता है। पहचान एक जटिल अवधारणा है, जो हमारी भाषा, संस्कृति, नस्ल, परंपराओं व प्रथाओं से गुंथी होती है। अपनी पुरानी पहचान को त्यागकर नई पहचान अपनाना बहुत मुश्किल होता है। अमेरिका में सबसे पहले योरोप से आए प्रवासी बसे। इन प्रवासियों के लिए नई अमेरिकी पहचान अपनाना अपेक्षाकृत आसान था क्योंकि यद्यपि वे भिन्न भाषा-भाषी व अलग-अलग सांस्कृतिक पृष्ठभूमियों से थे तथापि वे सभी योरोपीय व प्रोटेस्टेंट ईसाई थे। चूंकि वे सब प्रोटेस्टेंट योरोपियन थे इसलिए उनके लिए पहचान का ”मेल्टिंग पांट” माडल अपनाना आसान था, अर्थात अलग-अलग पहचानों के एक-दूसरे में घुलने-मिलने से एक नई, संयुक्त अमेरिकी पहचान का उदय।
अफ्रीकी व एशियाई देशों से आए प्रवासियों के लिए यह करना इतना आसान नहीं था। वे ईसाई नहीं थे, योरोपियन नहीं थे और उनकी त्वचा का रंग एकदम अलग था। उनकी संस्कृति भी अमेरिकी संस्कृति से बिलकुल जुदा थी। चूंकि वे अपनी मूल पहचान को पिघला कर, अमेरिकी पहचान में उस तरह मिला नहीं सके जैसा कि योरोपियनों ने किया था इसलिए एक नई शब्दावली अस्तित्व में आई। वे अफ्रीकी-अमेरिकी, भारतीय-अमेरिकी, पाकिस्तानी-अमेरिकी, चीनी-अमेरिकी, कोरियाई-अमेरिकी आदि कहलाने लगे। यह एक अर्थ में अधिक यथार्थवादी व प्रजातांत्रिक वर्गीकरण था। अत: अमेरिका में रहने वाले मुसलमान को मात्र अमरीकन कहना पर्याप्त नहीं होता। वे सऊदी-अमेरिकी, ईरानी-अमेरिकी आदि कहलाते हैं। नि:संदेह सऊदी अरब, ईरान व मिस्त्र आदि में ईसाई, यहूदी व अन्य धर्मों के लोग भी रहते हैं परंतु उनकी आबादी इतनी कम है कि सऊदी अमेरिकी या ईरानी-अमेरिकी शब्दों का अर्थ अमेरिका में रहने वाले सऊदी अरब या ईरान को मुसलमान समझा जाता है।
पुस्तक का पहला खंड, अमेरिकी पहचान के बारे में है व दूसरा खंड है ”अमेरिका में इस्लाम”। दूसरे खंड का चौथा अध्याय, अफ्रीकी-अमरीकियों पर केंद्रित है। अफ्रीकी मुसलमान, अमेरिका में बसने वाले पहले मुसलमान थे। वे अमेरिका में सदियों से रह रहे हैं। यहां तक कि वे अपनी अफ्रीकी जड़ों को पूरी तरह भुला चुके हैं। यही कारण है कि जब एक अफ्रीकी-अमेरिकी ने लंबे व कठिन अनुसंधान के बाद अपनी अफ्रीकी जड़ों को खोज निकाला और अपने इस सफल प्रयास पर एक पुस्तक लिखी तो यह पुस्तक जम कर बिकी। यह इसी बात का सबूत है कि मानव को अपनी मूल जड़ों, अपनी मूल पहचान से कितना लगाव होता है। इससे ही हम यह कल्पना कर सकते हैं कि हाल में अमेरिका में बसे प्रवासियों की क्या स्थिति होगी।
पुस्तक के तीसरे खंड में प्रवासियों के अपने नए परिवेश से सामंजस्य स्थापित करने व उसके अनुरूप स्वयं में परिवर्तन लाने के संघर्ष की कथा है। इस खंड में तीन अध्याय हैं जिनमें यहूदी, मुसलमान व अमरीकन होने के निहितार्थ पर चर्चा है। लेखक व उसका सर्वेक्षण दल, विभिन्न मुस्लिम समूहों के नेताओं के अलावा मस्जिदों के इमामों से भी मिला। अधिकतर मुलाकातें रेस्टोरेन्टों में लंच या डिनर पर हुईं या फिर मस्जिदों में। एक नमूना देखिए। इमाम फतीन सिफुल्लाह, लॉस वेगास (जिसे लेखक उसके जुए के अड्डों के कारण पाप-नगरी कहते हैं) की सबसे पुरानी मस्जिद के मुखिया हैं। वे बताते हैं कि अस् सबूर नामक इस मस्जिद में मोहम्मद अली व माईक टाईसन सहित कई जानी-मानी हस्तियां आती हैं। माईक टाईसन तो मस्जिद में नमाजियों के लिए बिछाई जाने वाली दरियों की सफाई में भी हाथ बंटाते हैं।
इमाम फतीन एक आकर्षक व्यक्तित्व के धनी हैं। उनके व्यक्तित्व से मानो उर्जा उत्सर्जित होती रहती है। इमाम मुस्तफा की तरह वे एक ऐसे बुद्धिजीवी लगते हैं जो अपनी आध्यात्मिक जिज्ञासाओं के समाधान के लिए, रेगिस्तान में रह रहा हो। लेखक, फतीन की एक दिलचस्प आपबीती बताते हैं। एक बार फतीन, कुछ अन्य अफ्रीकी-अमेरिकी मुसलमानों के साथ एक शेख से मिलने पहुंचे। वे पारंपरिक मुस्लिम वेशभूषा में थे। शेख ने पूछा, ”अमरीकन कहां हैं?” ”हम लोग ही अमरीकन हैं,” फतीन ने जवाब दिया। इस पर शेख ने कहा कि फिर वे लोग मोरक्कन वेशभूषा में क्यों हैं? ”अपने अमरीकन होने के तथ्य को प्रदर्शित करो। अमरीकन बनो।”
अकबर अहमद ने पूरे अमेरिका में घूम-घूम कर वियतनामी, चीनी व कंबोडियाई मुसलमानों जैसे छोटे समुदायों के अलावा बड़ी मुस्लिम आबादी वाले देशों जैसे इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड, भारत, पाकिस्तान व अरब और अफ्रीकन देशों के मुस्लिम प्रवासियों से चर्चा की। इस चर्चा से यह स्पष्ट उभरकर आया कि विभिन्न देशों के मुसलमानों के अलग-अलग दृष्टिकोण व अलग-अलग चिंताएं हैं। यह पुस्तक, इस मिथक का पुरजोर खंडन करती है कि अमेरिका के सभी मुसलमान, ओसामा-बिन-लादेन के प्रशंसक हैं या अल् कायदा का समर्थन करते हैं।
मुसलमानों की नई पीढ़ी पर अमेरिका का रंग चढ़ गया है और पुरानी पीढ़ी के मुस्लिम प्रवासी इससे परेशान हैं। उन्हें डर है कि वे अपनी भाषा और संस्कृति को हमेशा के लिए खो बैठेंगे। वे चाहते हैं कि युवा पीढ़ी अपनी मूल संस्कृति व भाषा को सीखे-जाने। इस अध्ययन से यह भी साफ है कि श्वेत अमेरिकी, उतने धर्मनिरपेक्ष व उदारवादी नहीं हैं जितना कि हम उन्हें समझते हैं। अनेक साक्षात्कारों से पता चलता है कि अमेरिकी जीवन शैली में स्वयं को ढ़ाल लेने के बावजूद, मुसलमानों को किस तरह के भेदभाव का सामना करना पड़ता है। उन पर हिंसक हमले भी होते हैं और कुछ युवा मुसलमानों ने इन हमलों का प्रतिकार करने के लिए हथियारबंद गिरोह भी बना लिए हैं।
यह पुस्तक, अमेरिकी मुसलमानों पर एक गंभीर व तथ्यपरक अध्ययन है। यद्यपि लेखक जाने-माने मानवशास्त्री हैं तथापि उन्होंने क्लिष्ट शब्दावली के उपयोग से बचते हुए, पुस्तक ऐसी भाषा में लिखी है जिसे आम आदमी भी समझ सके।
(लेखक मुंबई स्थित सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसायटी एंड सेक्युलरिज्म के संयोजक हैं, जाने-माने इस्लामिक विद्वान हैं अंौर कई दशकों से साम्प्रदायिकता व संकीर्णता के खिलाफ संघर्ष करते रहे हैं।)

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